भारत सरकार के जलनायक पत्रकार शिवाजी घाडगे
महाराष्ट्र में बीते तीन दशकों से भी अधिक समय से पत्रकारिता क्षेत्र में कार्यरत हूं. अपनी इस पत्रकारिता के दौर में मैंने जलसाक्षरता और प्रबंधन के संदर्भ में काफी कवरेज किया है और इसके माध्यम से समाज में जल प्रबोधन का कार्य कर रहा हूं. जल ही जीवन है और उसका इस्तेमाल काफी सम्मान और मितव्ययी के साथ करना चाहिए, ऐसा प्रचार करने का कार्य मैंने किया है.कोई भी कार्य बिना प्रचार प्रसार के जन-जन तक नहीं पुहंच सकता जल के विषय पर जागरूकता के लिए पत्रकार बिरादरी की सक्रियता बहुत जरुरी है मै पत्रकार शिवाजी घाडगे महाराष्ट्र मे बीते तीन दंशको से पत्रकारिता कर रहा हू मैने महाराष्ट्र मे बीते तीन दशंको से जल साक्षरता पर काम कर रहा हु हजारो स्कूल के बच्चों को प्रबोधन कर जल बचाव का संदेश दिया है और दूषित नदी सफाई मे योगदान भी दिया हैमस्त सौरमण्डल मे हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जल हजल है इसीलिए पृथ्वी पर जीवन है
फिलाल मानवीय गतिविधियों के कारण समस्त संसार में जल की उपलब्धता दिनोंदिन समस्या बनती जा रही है
एकतरफ पानी कि किल्लत है और दुसरीऔर जो नादिया बहती है उसी का पानी दुषित कर रह है .
हम सभी जानते है कि, हमारे ग्रामीण इलाकों में रहने वाली जनता का ७० प्रतिशत जीवन खेती पर निर्भर है और ज्यादातर खेती बारिश के पानी पर ही निर्भर रहती है. इस कारण से बारिश का बहकर जाने वाला पानी अगर विभिन्न बांधों के माध्यम से रोका गया तो जमीन जलस्तर डेढ़ से दो मीटर तक बढ़ सकता है. जलस्तर बढ़ोतरी के चलते पानी का अच्छा उपयोग सिंचाई के लिए किया जा सकता है. पानी की बूंद-बूंद जमीन में रिसती चली गई तो उसका काफी लाभ खेती के लिए हो सकता है. जल और मृद संधारण के कार्य के चलते पिछले कुछ वर्षों में लाखो हेक्टेयर जमीन सिंचाई के तहत आई है. साथ में पानी का उचित उपयोग किया जाए तो उसका लाभ हजारो किसानों को हो रहा है. जलशक्ति के माध्यम से कई सारे काम किसान और आम लोगों की सहभागिता से संभव हुए है. इससे ज्यादा से ज्यादा बारिश का पानी जमीन में फिर से भरने के चलते ग्रामीण जनता को काफी लाभ हो रहा है. गांव में शाश्वत तौर पर पानी की उपलब्धता होने के लिए सिंचाई का उचित तालमेल बिठाने के लिए पानी को विभिन्न जलाशयों में संग्रहित किया जाए तो गांव में पानी की समस्या हमेशा के लिए दूर हो सकती है. सिंचाई के लिए पर्याप्त मात्र में पानी संरक्षित कर उसके इस्तेमाल के लिए गांवों में बंद पड़ी जलापूर्ति योजनाओं को पुनर्जीवित कर पानी संग्रहण बढ़ाना उचित होगा. इसके लिए भूजल अधिनियम के अमल से विकेंद्रित जल संग्रहण निर्माण करना, बांधों का निर्माण करना, तालाबों का निर्माण, सिमेंट के बांध, जनता के सहयोग से जलाशयों का तलछट निकालना, पानी का नियोजन इसके संदर्भ में जनजागृति कर लोगों को महत्व समझाया. पानी का उचित इस्तेमाल करने पर वॉटरशेड विकास को गति प्राप्त होकर लघु सिंचाई, तालाब, लघुसिंचाई मरम्मत, नूतनीकरण, शृंखला सिमेंट नाला बांधों के कार्य, गहराईकरण-चौड़ाईकरण, गांव तालाब, संग्रहण तालाब, शिवकालीन-ब्रिटिशकालीन तालाब, अहिल्याबाई बावड़ी, नाले, कुएं पुनर्भरण, पानी के स्रोत का मजबुतीकरण ऐसे कार्यों के उद्देश्य सामने रखते हुए जलशक्ति के चलते जलसंरक्षण के कार्य में वृद्धि हुई है. जलस्तर में बढ़ोतरी होकर इसका उपयोग खेती के सिंचाई के लिए कैसे ज्यादा से ज्यादा हों, इस दिशा में प्रबोधन और जनजागृति की. केवल इतना ही नहीं, बल्कि जलसंरक्षण के कार्य में मैंने प्रत्यक्ष तौर पर अपना योगदान भी दिया. पानी की एक-एक बूंद का सम्मान
पानी हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है. अगर धरती पर पानी ना हों तो मनुष्य ही नहीं बल्कि सभी प्राणी, पक्षी, जीव-जंतु और वनस्पति पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगे. ऐसे महत्वपूर्ण पानी के इस्तेमाल के संबंध में हमें हेमशा जागृत रहने की आवश्यकता है. अगर हम ऐसा कर पाएं तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ अच्छी विरासत छोड़कर जाएंगे. इसके लिए पानी का उचित सम्मान जरुरी है. इस दिशा में मैंने इतने वर्षों में कई सारे कार्य किए है.- जल और पर्यावरण : एक अनोखा रिश्ताप्राकृतिक मौसम में काफी बदलाव हुआ है. ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के चलते ऐसा हो रहा है. कुछ वर्ष पहले हमारे यहां कृत्रिम बारिश का प्रयोग हुआ था. लेकिन आखिर कृत्रिम प्राकृतिक बारिश की कैसे बराबरी कर सकता है. प्राकृतिक देन ही प्रकृति को बचा सकती है. कृत्रिमता से प्रकृति का कोई बचाव नहीं हो सकता.
बारिश के पानी का तेजी से बहकर जाना, जमीन में ना रिसना, इसके चलते जमीन का क्षरण हुआ. एक इंच उपजाऊ जमीन बनने के लिए सैंकड़ो वर्ष लगते है. वृक्ष, कीटक, पक्षी, पशू जमीन की पोषकता को बढ़ाते है. पानी संरक्षण से कृषि उत्पादन बढ़ता है. जिससे किसानों की प्रगति होती है. जमीन, पानी, सूरज की ऊर्जा को संरक्षित कर उसका उचित उपयोग होना आज समय की जरुरत है. जब देश आजाद हुआ था, उस समय प्रति व्यक्ति ६ हजार घनमीटर पानी की उपलब्धता थी. आज १ हजार २५० घनमीटर तक वह कम हुई है. यह एक चिंताजनक स्थित है. देश के १८८ जिलों के ९७२ तहसीलों में डीपीएपी प्रोजेक्ट चलाया जाता है. फिर भी ३०० से अधिक जिलों में केंद्र सरकार को सूखा घोषित करने की स्थिति आई है. कुछ जगहों पर बेहद ज्यादा पानी तो कुछ जगहों पर कुछ भी नहीं. ऐसी विषम स्थिति आज हमारे समक्ष उपस्थित है.महाराष्ट्र के कुल ३६ जिलों में से १४ आज सूखाग्रस्त है. प्रत्यक्ष सिंचाई मात्र १८ प्रतिशथ है. महाराष्ट्र में १ हजार ५२९ बांध है. लेकिन प्रकृति के प्रकोप के चलते कहीं पर काफी कम बारिश तो कहीं काफी ज्यादा, ऐसी स्थिति है. कई जगहों पर पानी के लिए मेंडकों के विवाह किए जाते है. लेकिन इससे बारिश थोड़े ही आएगी. इसके लिए एक ही इलाज है बहकर जाने वाले पानी को रोकना. इसीसे जलस्तर बढ़ेगा और पानी की उपलब्धता होगी.पानी का दैनंदिन महत्व है
कहते है कि, वाणी और पानी दोनों का इस्तेमाल काफी सोच समझकर से करना चाहिए. वाणी से हमारा वर्तमान अच्छा गुजरता है, जबकि पानी से हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा. अपने सुरक्षित भविष्य के लिए पानी का इस्तेमाल मितव्ययी से करना चाहिए. पानी आज हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है. उसका उचित इस्तेमाल हम सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य है. पानी का नियोजन और मितव्ययी से इस्तेमाल विभिन्न तरह से फायदेमंद है. विभिन्न मार्गों से पानी का ज्यादा से ज्यादा नियोजन करें. भविष्य में बाढ़ जैसी समस्याओं को रोकने के लिए नदियों को जोड़ने का प्रोजेक्ट काफी महत्वपूर्ण साबित होगा. या फिर रेन हार्वेस्टर जैसे उपायों पर अमल करना होगा.
पीन के लिए, स्वच्छता के लिए, मानवी और सभी जीवजंतुओं-वनस्पतियों की सेहत के लिए, अनाज की उपज और खाद्य निर्मिती के लिए, मत्स्योत्पादन, सिंचाई, उद्योग-धंदों के विकास, बिजली उत्पादन और मनोरंजन के साधनों के लिए पानी एक आवश्यक घटक है. इन सभी जरुरतों को पूरा करने के लिए जलसंधारण मुख्य उद्दिष्ट है. भूमिजल जलसंधारण का एक अहम स्रोत है. बांधों को बांधकर की जाने वाले जल संग्रहण से अधिक भूमिगत जलसंग्रहण काफी कम खर्च में होता है. इसके लिए ज्यादा प्रयास भी नहीं करने होते है.
जमीन पर पड़ने वाला पानी बहकर जाने में पेड़ों के चलते प्रतिरोध होता है. इससे पानी जमीन में अधिक रिसता है. जिस पाणलोट क्षेत्र में जंगल और झाड़ियां होती है, वहां की मिट्टी पानी को जमीन में रिसने में मदद करती है. झाड़ियों के चलते मृदा अपरदन कम होता है. वन संरक्षण के चलते भूमिगत पानी के स्रोत बढ़ाया जा सकता है, यही इसका कारण है. पथरीली जमीन से पानी बहकर जाता है. इस क्षेत्र के पानी को भी जमीन में गहराई तक उतरना जरुरी है.
पानी लेकर जाने वाले नालों में पानी को रोककर उसके प्रवाह की गति अगर कम की जाए, तो पानी को जमीन में सोखा जा सकता है. साथ में पहाड़ों की तलहटी तथा पहाडों की ढलान पर बहने वाले पानी की गति को कम कर पाएं तो वही पानी जमीन के अंदर पहुंच कर जलस्तर बढ़ाया जा सकता है. इस क्रिया के लिए पहाड़ों की ढलान की उलटी दिशा में खास तरीके का उतरा बनाए. इससे मूलत: उतार से बहने वाले पानी को रोका जा सकता है और उसे जमीन के अंदर उतारा जा सकता है. इससे जमीन का अपरदन रोककर जलस्तर बढ़ाया जा सकता है.
ज्यादातर विद्युत उत्पादन, सिंचाई, नागरी बस्तियां और औद्योगोक प्रकल्पों को पानी की सप्लाई काफी लगती है. केवल भूमि जल पर निर्भर ना रहते हुए उन्हें जल्द जलापूर्ति करना संभव नहीं होता. इसके लिए विभिन्न प्रयासों से जमीन की उपरी सतह से बहकर जाने वाले पानी को रोक कर जलाशयों का निर्माण करना होगा. आसपास के नालों के प्रवाहों को मोड़कर जलाशयों में पानी उपलब्ध कराना संभव है. अगर कहीं दलदल है तो उसमें खुदाई कर उसका पानी मुख्य जलाशयों में छोड़ा जाता है. सालभर बहने वाली नदियों के प्रवाहों में चालू-बंद होन वाले लोहे के दरवाजे बिठाकर जल प्रवाह रोका जाए तो और उस पानी को पंपिंग कर जरुरत वाली जगहों पर ले जाया जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. जगह-जगह बांधों का निर्माण कर पानी का संग्रहण जरुरी है. यह सभी प्रयास किए जाएं तो जलकिल्लत की समस्या को हल किया जा सकता है और सभी को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराया जा सकता है.
मराठी मे कहावत है पानी,नानी,और,वानी का सही सोच समझकर सही इस्तेमाल करे.अगर भविष्य मे पानी का सही इस्तेमाल नही किया तो हमारी ऑखो मे आये गा. किसी को पानी की जरुरत नही ऐसा कोई भी नही पानी का सही उपयोग करना हर एक की जिम्मेदारी है.
अब कोई कहेगा भी हम पानी नही ज्युस पीके जीये गे लेकिन ज्युस बनाने के लिए भी पानी लगता है भाई.
कहते है गन्ना डोगा होता है लेकिन गन्ने का लस मिठ्ठा होता है.नदी डोगी होती है लेकिन पानी अच्छा रहता है.औ नदी जब गाव से बह जाती है तो सभी गाव वालो को पानी देकर जाती है.वह कोई भेद भाव नही करती .आज नदी का जल प्रदुषित हो रहा है यह बडी दुःख की बात है.हमारा काम अब हुवा हमे क्या यह मत सोचो अपने लिये तो सब जिते है लेकिन दूसरों के लिये देश के लिये जिना सिखो और अच्छा कामकाज करो.
एक ही कॅनाल से फसल के लिए पानी दिया जाता है लेकिन मिर्च मिर्च है और गन्ना मीठा होता है.यह पानी का कोई दोष नही बिज जैसा हो वैसी फसल उबती है
धरने और बांध यहै हमारी मंदिर है और पानी यह हमारी देवता है.
भविष्य मे खेती के लिए पानी देने मे स्पिंकलरऔर ठिंबक इस्तेमाल होना जरुरी है और रेनवाॅटर हर्विसिग ,वाटर रिसायकलिग इस्तेमाल होना जरुरी है जय हिंद जय भारत
जलनायक पत्रकार- शिवाजी घाडगे
मु-पो- शिवाजीनगर,राहुरी
जिल्हा- अहमदनगर
महाराष्ट्र
(मोबाईल- 9890221196)
ईमेल- shivajighadge11@gmail.com
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